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Wishes
Motivational
सुख और दुख ऋतुओं की तरह आते-जाते हैं; उन्हें धैर्य से सहो।
Bhagavad Gita
जो सुख और दुख में समान रहता है, वही शाश्वत मुक्ति के योग्य होता है।
Bhagavad Gita
सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर कर्म में लगो; ऐसा करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
Bhagavad Gita
इस मार्ग पर किया गया कोई भी सच्चा प्रयास व्यर्थ नहीं जाता; थोड़ा-सा अभ्यास भी बड़े भय से रक्षा करता है।
Bhagavad Gita
निश्चयी बुद्धि की एक ही दिशा होती है; अनिश्चित बुद्धि अनेक दिशाओं में बँट जाती है।
Bhagavad Gita
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर नहीं। फल को अपना उद्देश्य मत बनाओ, और अकर्म से भी मत जुड़ो।
Bhagavad Gita
समत्व में स्थित होकर कर्म करो, सफलता और असफलता के प्रति आसक्ति छोड़ दो।
Bhagavad Gita
बुद्धियुक्त पुरुष इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों त्याग देता है; इसलिए योग में लगो — योग कर्म में कुशलता है।
Bhagavad Gita
जिसका मन दुख में विचलित नहीं होता, और जो सुख, भय और क्रोध से मुक्त है, वही स्थिरबुद्धि है।
Bhagavad Gita
अपना नियत कर्म करो; अकर्म से कर्म श्रेष्ठ है।
Bhagavad Gita
आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य करो; निष्काम कर्म से मनुष्य परम पद पाता है।
Bhagavad Gita
श्रेष्ठ पुरुष जो करता है, दूसरे उसी का अनुसरण करते हैं; वह जो मानक रखता है, संसार उसी को प्रमाण मानता है।
Bhagavad Gita
सब कर्म मुझे अर्पित कर, मन को आत्मा में स्थिर कर, कामना और ममता से मुक्त होकर युद्ध करो — संताप छोड़कर।
Bhagavad Gita
दूसरे के मार्ग का पूर्ण अनुसरण करने से अपना धर्म अपूर्ण रूप से निभाना श्रेष्ठ है।
Bhagavad Gita
आत्मा को बुद्धि से परे जानकर मन को स्थिर करो और दुर्जय काम रूपी शत्रु को जीतो।
Bhagavad Gita
ज्ञानी अकर्म में कर्म और कर्म में अकर्म देखता है; वह अपने हर काम में कुशल रहता है।
Bhagavad Gita
फल की आसक्ति त्यागकर, सदा संतुष्ट और आत्मनिर्भर रहने वाला कर्म करते हुए भी मुक्त रहता है।
Bhagavad Gita
जो सहज प्राप्त में संतुष्ट है, ईर्ष्या से परे है, और सफलता-असफलता में समान है, वह कर्म से नहीं बँधता।
Bhagavad Gita
श्रद्धा और विवेक से रहित मनुष्य को संशय खा जाता है; निरंतर संशय करने वाले को न यह लोक मिलता है, न सुख।
Bhagavad Gita
निष्काम कर्म में स्थित, शुद्ध मन और जितेंद्रिय पुरुष सबके लिए कर्म करते हुए भी अलिप्त रहता है।
Bhagavad Gita
संयमी पुरुष फल त्यागकर स्थायी शांति पाता है; असंयमी फल की आसक्ति से बँध जाता है।
Bhagavad Gita
प्रिय घटनाओं से हर्षित मत हो, अप्रिय से विचलित मत हो; बुद्धि में स्थिर रहो।
Bhagavad Gita
जो इसी जीवन में, शरीर छूटने से पहले, काम और क्रोध से उठे वेग को सह लेता है — वही योगी है, वही सुखी है।
Bhagavad Gita
मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे। आत्मा ही आत्मा का मित्र है, और आत्मा ही आत्मा का शत्रु।
Bhagavad Gita
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