Skip to main content
Home
About
Home
Events
Wishes
Dashboard
Account
Portrait view works best
Please rotate back to portrait to continue.
Wishes
Good Morning
इस मार्ग पर किया गया कोई भी सच्चा प्रयास व्यर्थ नहीं जाता; थोड़ा-सा अभ्यास भी बड़े भय से रक्षा करता है।
Bhagavad Gita
राग और द्वेष से मुक्त होकर संयम से जीवन बिताने वाला प्रसन्नता पाता है।
Bhagavad Gita
प्रसन्नता में दुख मिट जाता है; शांत मन से बुद्धि स्थिर हो जाती है।
Bhagavad Gita
जैसे नदियाँ भरे समुद्र में समा जाती हैं पर उसे विचलित नहीं करतीं, वैसे ही कामनाओं से अभिभूत न होने वाला शांति पाता है।
Bhagavad Gita
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ नहीं; समय के साथ साधक उसे अपने भीतर पाता है।
Bhagavad Gita
बाहरी सुखों से अनासक्त पुरुष अपने भीतर गहरा सुख पाता है।
Bhagavad Gita
जिसका आनंद, विश्राम और प्रकाश भीतर ही है, वह आत्मिक मुक्ति पाता है।
Bhagavad Gita
मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे। आत्मा ही आत्मा का मित्र है, और आत्मा ही आत्मा का शत्रु।
Bhagavad Gita
आहार, विहार, कर्म, नींद और जागरण में संतुलित रहने वाले के लिए योग दुखों का नाश करने वाला बन जाता है।
Bhagavad Gita
ध्यान में स्थिर मन वायुरहित स्थान में रखे दीपक जैसा है, जिसकी लौ नहीं काँपती।
Bhagavad Gita
चंचल मन जहाँ-जहाँ भटके, उसे धीरे से लौटाकर आत्मा के वश में लाओ।
Bhagavad Gita
मैं जल में रस हूँ, चंद्र और सूर्य में प्रकाश, सब वेदों में ॐकार, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पौरुष हूँ।
Bhagavad Gita
ईश्वर पृथ्वी की पवित्र गंध है, अग्नि का तेज, सब प्राणियों का जीवन और साधकों का तप।
Bhagavad Gita
तुम जो भी करो, खाओ, अर्पित करो, दान दो या तप करो — उसे अर्पण बना दो।
Bhagavad Gita
करुणावश ईश्वर ज्ञान के प्रकाशमान दीपक से भीतर का अंधकार मिटा देते हैं।
Bhagavad Gita
जो वाणी किसी को उद्विग्न न करे, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा नियमित स्वाध्याय — यह वाणी का तप कहलाता है।
Bhagavad Gita
प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और भाव की शुद्धि — यह मन का तप है।
Bhagavad Gita
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।2.40।।
Bhagavad Gita
ನೇಹಾಭಿಕ್ರಮನಾಶೋಽಸ್ತಿ ಪ್ರತ್ಯವಾಯೋ ನ ವಿದ್ಯತೇ| ಸ್ವಲ್ಪಮಪ್ಯಸ್ಯ ಧರ್ಮಸ್ಯ ತ್ರಾಯತೇ ಮಹತೋ ಭಯಾತ್||೨.೪೦||
Bhagavad Gita
நேஹாப⁴ிக்ரமநாஶோ(அ)ஸ்தி ப்ரத்யவாயோ ந வித³்யதே| ஸ்வல்பமப்யஸ்ய த⁴ர்மஸ்ய த்ராயதே மஹதோ ப⁴யாத்||௨.௪௦||
Bhagavad Gita
నేహాభిక్రమనాశోఽస్తి ప్రత్యవాయో న విద్యతే| స్వల్పమప్యస్య ధర్మస్య త్రాయతే మహతో భయాత్||౨.౪౦||
Bhagavad Gita
നേഹാഭിക്രമനാശോഽസ്തി പ്രത്യവായോ ന വിദ്യതേ| സ്വല്പമപ്യസ്യ ധര്മസ്യ ത്രായതേ മഹതോ ഭയാത്||൨.൪൦||
Bhagavad Gita
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।२.४०।।
Bhagavad Gita
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।2.64।।
Bhagavad Gita
More