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Bhagavad Gita
ज्ञानी न जीवित लोगों के लिए शोक करते हैं, न उनके लिए जो चले गए।
Bhagavad Gita
देहधारी जैसे इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा पार करता है, वैसे ही वह दूसरा शरीर भी पाता है; धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।
Bhagavad Gita
सुख और दुख ऋतुओं की तरह आते-जाते हैं; उन्हें धैर्य से सहो।
Bhagavad Gita
जो सुख और दुख में समान रहता है, वही शाश्वत मुक्ति के योग्य होता है।
Bhagavad Gita
असत् का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं, और सत् का कभी अभाव नहीं होता।
Bhagavad Gita
आत्मा अजन्मा और शाश्वत है; शरीर के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होती।
Bhagavad Gita
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही देहधारी जीर्ण शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करता है।
Bhagavad Gita
आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है, न वायु सुखा सकती है।
Bhagavad Gita
जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है; इसलिए जो अटल है उस पर शोक मत करो।
Bhagavad Gita
सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर कर्म में लगो; ऐसा करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
Bhagavad Gita
इस मार्ग पर किया गया कोई भी सच्चा प्रयास व्यर्थ नहीं जाता; थोड़ा-सा अभ्यास भी बड़े भय से रक्षा करता है।
Bhagavad Gita
निश्चयी बुद्धि की एक ही दिशा होती है; अनिश्चित बुद्धि अनेक दिशाओं में बँट जाती है।
Bhagavad Gita
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर नहीं। फल को अपना उद्देश्य मत बनाओ, और अकर्म से भी मत जुड़ो।
Bhagavad Gita
समत्व में स्थित होकर कर्म करो, सफलता और असफलता के प्रति आसक्ति छोड़ दो।
Bhagavad Gita
बुद्धियुक्त पुरुष इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों त्याग देता है; इसलिए योग में लगो — योग कर्म में कुशलता है।
Bhagavad Gita
जब मनुष्य चंचल कामनाओं को छोड़कर अपने भीतर संतोष पाता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
Bhagavad Gita
जिसका मन दुख में विचलित नहीं होता, और जो सुख, भय और क्रोध से मुक्त है, वही स्थिरबुद्धि है।
Bhagavad Gita
अनुकूल और प्रतिकूल घटनाओं में अनासक्त रहो, न हर्षित हो, न द्वेष करो।
Bhagavad Gita
राग और द्वेष से मुक्त होकर संयम से जीवन बिताने वाला प्रसन्नता पाता है।
Bhagavad Gita
प्रसन्नता में दुख मिट जाता है; शांत मन से बुद्धि स्थिर हो जाती है।
Bhagavad Gita
संयम के बिना स्थिर बुद्धि नहीं, स्थिरता के बिना शांति नहीं; और शांति के बिना सुख कहाँ?
Bhagavad Gita
जैसे नदियाँ भरे समुद्र में समा जाती हैं पर उसे विचलित नहीं करतीं, वैसे ही कामनाओं से अभिभूत न होने वाला शांति पाता है।
Bhagavad Gita
जो ममता और अहंकार त्यागकर कामना रहित होकर चलता है, वही शांति पाता है।
Bhagavad Gita
अपना नियत कर्म करो; अकर्म से कर्म श्रेष्ठ है।
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